मज़हब नही सिखाता आपस में बैर रखना

           धर्म, मज़हब, पंथ तो बस शब्द हैं
                  असल में भाईचारा क़ायम रहना ज़रूरी है
          मिल जुल कर रहने में ही सबका भला है
इसलिए हर नफ़रत में प्यार और मिठास का होना ज़रूरी है।

इस पूरे संसार में अनेक धर्म (मज़हब), सम्प्रदाय और पंथ प्रचलित हैं, परंतु कोई भी धर्म, एक-दूसरे से ईर्ष्या, द्वेष और वैर भाव रखने का सन्देश नहीं देता है। हर एक धर्म आपसी मेल-मिलाप तथा भाईचारे का ही उपदेश देता है। मज़हब या धर्म कोई कच्चे धागे की डोर नहीं है, वह किसी के स्पर्श मात्र से टूटकर बिखर नहीं सकती, यह तो अपने-आप में ही इतनी पवित्र, महान और शक्तिशाली है कि इनका स्पर्श पाकर ही अपवित्र भी पवित्र बन जाया करता है। 

हर मज़हब के पैगम्बर या धर्म-स्थापक की शिक्षाएं, अपने भक्तों को मानवीय प्रेम का पाठ पढ़ाती हैं। गीता, क़ुरान, गुरु ग्रन्थ साहिब, बाइबिल आदि विभिन्न ग्रंथों में शांति एवं प्रेम से जीवन जीने की शिक्षाएँ दी गयी हैं। 

आज के समय में भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो भाईचारे में विश्वास रखते हैं और एक-दूसरे के साथ मिल-जुलकर रहते हैं। हर धर्म का सम्मान करने वाला व्यक्ति ही अपने जीवन में आगे बढ़ता है। एक व्यक्ति को दुःख पहुँचाकर दूसरा व्यक्ति कभी भी खुश नहीं रह सकता। हर धर्म से प्रेम करना ही हमारे जीवन और देश को खुशहाल बना सकता है। 

            कुछ लोग आपस में मिल-जुलकर रहते हैं
               हमेशा ही क़ायम रखते हैं भाईचारा,
          अगर हर शख़्स इन कुछ लोगों जैसे बन जायें
             तो कितनी तरक्की करेगा देश हमारा।।

मज़हब बैर कब फैलाता है? इसका भी एक कारण है। जिस समय मज़हब कुछ स्वार्थी लोगों के हाथ की कठपुतली बन जाता है, उस समय वह शत्रुता फैलाने का साधन बनता है। स्वार्थी नेता धर्म के नाम पर, जनता को आपस में लड़वाते हैं और उनमें फूट डाल कर अपनी कुर्सी पक्की करते हैं। इसी प्रकार धर्म को उपयोग की वस्तु बनाकर, वे विभिन्न धर्मों के लोगों को लड़वाकर अपना नेतृत्त्व पक्का करते हैं। और इन सबके बीच ही लोगों के अंदर एक-दूसरे के लिए बैर फैलता है।

निष्कर्ष रूप में यही कहा जा सकता है कि धर्म किसी को बैर भाव रखना नहीं सिखाता, बल्कि यह तो लोगों को आपस में जोड़ता है। हर मज़हब तो यही कहता है कि हम स्वयं भी सुख से जिएं और दूसरों को भी सुख से जीने दें। धर्म तो हर प्राणी में परमात्मा के दर्शन करवाता है। एक धार्मिक व्यक्ति हर किसी में ईश्वर का निवास देखता है, तभी तो वह सबसे प्रेम करता है।

                                 ना हिन्दू बनें 
                              ना मुसलमान बनें 
                     ना पैगम्बर बनें, ना भगवान बनें,
                     छोड़ो धर्म और मज़हब की बातें,
                 आओ हम सब मिलकर इंसान बनें।।

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