समकालीन नारी

"एक नारी सब पर भारी"; आज के समय में यह पंक्ति बिल्कुल सच है। आज देश में नारिओं में बहुत बदलाव आया है और वो अपने देश और परिवार का नाम रौशन कर रही हैं। आज नारी के जीवन की परिभाषा बदल चुकी है। वे अब पहली जैसी नहीं रही है, उसने अपने अस्तित्व को खुद बदल दिया है जिससे वह अब जीवन में कामयाबी को छू रही हैं। अब महिलाएँ पहले जैसे अपने घर की चौखट तक ही सीमित नहीं रही, अब वे ऊचाइयाँ को छूती हुई अपने जीवन में उड़ रही हैं। 

अब हर एक महिला में आत्मविश्वास बढ़ गया है, अब उसके कदमों को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता है। वह अब साहसी, सशक्त व आत्मनिर्भर है। अपने पैरों पर खुद खड़ी हो सकती है। नारिओं ने अपने बल पर अपनी खुद की पहचान बनाई है। महिलाओं को अपनी काबिलियत पर विशवास है तथा अब वे किसी से डरती नहीं है, हिम्मत कर के वे सबका सामना खुद करती हैं।

महिलाएँ अब किसी एक चीज़ पर सीमित नही रहीं, हर एक क्षेत्र में अपना योगदान देती हैं। अब नारियाँ डॉक्टर भी हैं, इंजीनियर भी, शिक्षिका, कलाकार, नृत्यांगना आदि सब हैं। वे अपने देश का भी प्रतिनिधत्व संभालती हैं। राजनीतिक स्तर पर भी वे पीछे नहीं रही है। हर एक कार्यालय में उनका भी योगदान पुरुषों के बराबर का रहा है और यह बात भी सच है कि वे अब पुरुषों से बहुत आगे निकल चुकी हैं।  

पहले के समय में औरतों को सिर्फ़ घर में रहने का आदेश होता था, वे घर को, बच्चों को बुज़ुर्गों को ही संभालती थीं तथा उन्हीं का काम एवं सेवा करती थीं। पहले का समय पुरुष प्रधान का था, जहाँ नारिओं को बहुत ही ज़्यादा कमज़ोर समझा जाता था। उन्हें पढ़ाई-लिखाई नहीं करवाई जाती थी, घर का काम करना सिखाया जाता था। पुरुषों की मानसिकता बहुत संकीर्ण होती थी, वे औरतों को सिर्फ़ एक खिलौना समझते थे और बस उनसे घर का काम करवाते थे। ये सब बातें औरतों को भी नहीं चुभती थीं और वे चुपचाप सारा काम करती रहती थीं क्योंकि उनकी मानसिकता भी संकीर्ण होने से ग्रसित रहती थी। पढ़ने-लिखने पर कोई ध्यान नहीं होता था। पुरुष लोग महिलओ पर अत्याचार, मारपीट करते थे, जिसपर वह ज़रा-सी भी आवाज़ नहीं करती थी। हमेशा से ही हर एक तकलीफ, दुःख एवं दर्द को सहन करती हुई अपना जीवन संघर्षों एवं संकटों, परेशानिओं में ही निकाल देती थीं।

पर अब यह स्तिथि बदल चुकी है, महिलाएँ अब चुप नहीं रहती, अपनी आवाज़ उठाती हैं और अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का सामना करती हैं और उन्हें होने से रोकती हैं एवं अपनी ज़िंन्दगी को एक नयी दिशा देती हैं। महिलाओं पर हमेशा होने वाले अत्याचारों, बलात्कारों को अब वह चुनौती देती हैं और अपने हक की लड़ाई को खुद लड़ती हैं।  

संघर्षों से लड़ते हुए, हर बात को चुनौती देते हुए, आज महिलायें अपने जीवन में आगे बढ़ी हैं और उन्होंने अपने जीवन को खुद संभाला है। अब औरतें घर भी संभालती हैं और साथ ही ऑफिस भी जाती हैं। उन्होंने खुद को सशक्त बना लिया है और अब वह किसी से भी कम नहीं है। अब कोई उन्हें नीचा या कमज़ोर नहीं समझ सकता क्योंकि इन्होंने अपनी ज़िन्दगी की लकीरें खुद खींच ली हैं और अपने जीवन को स्वर्ग बना लिया है। अब एक महिला पर कोई भी व्यक्ति ज़बरदस्ती नहीं कर सकता है, वे सबसे सामना खुद कर सकती हैं। उन्हें अपने मनोबल पर विश्वास है और वे दुनिया के किसी भी अत्याचार से खुद लड़ने की क्षमता रखती हैं। आज की महिलाएँ किसी से भी कम नहीं हैं और हर क्षेत्र में प्रसिद्धि प्राप्त करते हुए वे आगे बढ़ रही है। बेटा बेटी दोनों एक समान हैं, दोनों के एक जैसे ही अधिकार हैं। अगर बेटा माथे का तिलक है तो बेटियाँ सिर का ताज होती हैं। उन्हें पढ़ाना-लिखाना उनका अधिकार है और उपलब्धियां प्राप्त करना उनके जीवन का लक्ष्य हैं।


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